Russia-ukraine war: रूस-युक्रेन संघर्ष में भारत की क्या भूमिका है? बीते कुछ दिनों से विदेशी प्रतिनिधि लगातार भारत यात्रा पर क्यों हैं?

Russia-Ukraine war: 


क्या रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत को गुटनिरपेक्ष लोकतंत्र के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को निभाना करना चाहिए?


रूस-यूक्रेन संघर्ष में भारत की भूमिका

यूक्रेन में युद्ध के चालीस से अधिक दिन बीत चुके हैं। वर्तमान परिदृश्य में यदि भारत की स्थिति की अन्य देशों के साथ तुलना की जाए तो भारत की भूमिका अन्य देशों की अपेक्षा अधिक प्रासंगिक प्रतीत होती है। 
ऐसा हम इसलिए नहीं कह रहे हैं कि हम भारतीय हैं, हमारे हृदय में भारत के प्रति सम्मान हैं, भारत के महत्व को हम अन्य देशों की अपेक्षा अधिक सम्मान देते हैं बल्कि यह पिछले दो हफ्तों में विदेशों से गणमान्य व्यक्तियों की लगातार भारत यात्रा से स्पष्ट है। 



भारत आने वाले इन विदेशी गणमान्य व्यक्तियों में से अधिकांश उन देशों के प्रतिनिधि थे जो रूस के खिलाफ USA और यूरोपीय संघ (European Union) के नेतृत्व वाले प्रतिबंध शासन का हिस्सा हैं। 


यहां हम नाटो देशों के लिए "प्रतिबंध शासन" शब्द का प्रयोग इसलिए कर रहे हैं क्योंकि यदि इस समूह के सदस्य देशों में से जर्मनी, फ्रांस और तुर्की को छोड़ दिया जाए तो इस समूह के मुख्य नेतृत्वकर्ता अर्थात अमेरिका और उसका सबसे बड़ा सहयोगी ब्रिटेन, इन दोनों देशों ने ही इस मुद्दे को, इस संघर्ष को अपने बयानों, चेतावनियों और प्रतिबंधों के जरिए बढ़ाने का ही काम किया। 


इन्होंने अभी तक दोनों ही पक्षों के प्रतिनिधियों से या राष्ट्र प्रमुखों से बातचीत करके मुद्दे को सुलझाने का प्रयास करने के लिए ना तो किसी मंच से कुछ कहा और ना ही इसके लिए पर्दे के पीछे से किसी प्रकार का कूटनीतिक प्रयास किया। हालांकि वर्तमान में चल रहे इस संघर्ष के लिए जिम्मेदार भी यही पश्चिमी देश हैं, जिनकी महत्वाकांक्षाओं एवं रूस के साथ प्रतिद्वंदिता ने यूक्रेन को इस संघर्ष का मैदान बना दिया।

रूस पर लगातार प्रतिबंध लगा लगा कर इन देशों ने वैश्विक परिदृश्य को ठीक वैसे ही बना दिया, जैसा प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात इन्होंने जर्मनी के साथ किया था और इसका परिणाम द्वितीय विश्व युद्ध के रूप में सबके सामने था। 


अमेरिका और यूरोपीय देशों का दोमुंहापन

बीते कुछ दिनों की मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो रूस पर प्रतिबंध लगाने में अग्रणी भूमिका निभाने वाले अमेरिका ने खुद इन प्रतिबंधों के दौरान बीते सप्ताह में रूस से तेल आयात 43% बढ़ा दिया है जबकि वह भारत को रूस से तेल खरीदने पर चेतावनी दे रहा है। 



अमेरिका के ही दबाव में यूरोपीय देशों ने भी रूस से तेल और गैस की खरीद बंद कर दी थी किंतु 1 सप्ताह से अधिक समय तक वे यह प्रतिबंध बरकरार नहीं रख सके और उन्होंने पुनः रूस से तेल और गैस खरीदना शुरू कर दिया।

भारत की स्वतंत्र विदेश नीति

इन पश्चिमी देशों की इसी तरह की दो मुंही हरकतों को देखकर भारत ने भी अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का परिचय देते हुए वैसी ही नीतियां अपनाई, जो भारत के हित में है। उसने सभी वैश्विक मंचों पर न तो रूस को समर्थन दिया और ना ही रूस का विरोध किया। 
रूस और यूक्रेन के इस संघर्ष के समय में, जब सारी दुनिया अपने आप को सार्वजनिक तौर पर रूस से व्यापार करने से रोकती रही वहीं भारत ने खुलेआम उससे 12 सुखोई लड़ाकू विमान का रक्षा एवं सस्ते दामों पर कच्चे तेल के लिए व्यापार सौदा किया तो साथ में इन पश्चिमी देशों के साथ भी लगातार संपर्क में रहा। 


भारत की इसी स्वतंत्र विदेश नीति और गुटनिरपेक्षता ने संपूर्ण मानव जगत को, संपूर्ण विश्व को इस संघर्ष के समय में शांति स्थापित करने वाला मार्ग दिखलाया। सभी देशों को वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में दो भागों में बंटी हुई इस दुनिया के दोनों ही पक्षों से समान और मजबूत संबंध रखने वाला भारत ही शांतिदूत की भूमिका निभाने वाला देश नजर आया।

भारत बना विदेशी प्रतिनिधियों और वैश्विक राजनीति का केंद्र

यही कारण है कि बीते कुछ हफ्तों से भारत विदेशी अतिथियों की यात्रा का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यहीं से रूस- यूक्रेन संघर्ष को रोकने की रूपरेखा तैयार की जा रही है। 

भारत आने वाले इन विदेशी प्रतिनिधियों के संदेश तीन-आयामी थे: 
  • भारत से संयुक्त राष्ट्र में अपना वोट बदलने के लिए कहना, जहां उसने रूस के आक्रमण की आलोचना करने वाले सभी प्रस्तावों से परहेज किया है;  
  • यह अनुरोध करना कि भारत छूट पर पेश किए जा रहे रूसी तेल की अपनी खरीद में "शीघ्रता" न करे;  और
  • भारत को रुपया-रूबल राष्ट्रीय मुद्रा-आधारित भुगतान तंत्र का उपयोग करने से हतोत्साहित करना, जो "बैकफिलिंग प्रतिबंधों" को हटा सकता है।  


विदेशों से जो भी संदेश गुप्त रूप से भारतीय प्रतिनिधियों तक पहुंच रहे थे, वह तब तेज और अधिक सार्वजनिक हो गए, जब यह स्पष्ट हो गया कि नई दिल्ली रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की भी मेजबानी करेगी, जबकि पश्चिम के अधिकारियों को भारत की स्थिति को अपने पक्ष में करने की उम्मीद थी।  

हालांकि, प्रधानमंत्री के साथ सौहार्दपूर्ण बैठक सहित उनका रेड कार्पेट स्वागत यह स्पष्ट करता है कि भारत किसी भी तरह की विदेशी दबाव में झुकने वाला नहीं है।  विदेश मंत्री एस जयशंकर और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी भारत के "राष्ट्रीय हित" को सर्वोपरि रखने के सरकार के सिद्धांत को मजबूत किया, क्योंकि प्रतिबंध शासन वाले देशों अर्थात् यूरोपीय देशों ने अभी तक रूस से तेल का आयात कम नहीं किया है।  


भारत-अमेरिका के बीच 2+2 वार्ता

यह संभावना है कि जब विदेश मंत्री जयशंकर और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह “2+2” बैठकों के लिए वाशिंगटन जाएंगे, तो अमेरिका भारत सरकार को उसके चुने हुए रास्ते से हटाने का एक और प्रयास करेगा, जहां रूस से एस-400 मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली की खरीद के लिए भारत को CAATSA (Countering America's Adversaries Through Sanctions Act) प्रतिबंधों की संभावना से छूट दी जा सकती है।  

अमेरिका रूस को बहुपक्षीय मंच पर अलग थलग करने का भी इच्छुक है। रूस की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से बर्बाद करने के लिए इस साल G-20 शिखर सम्मेलन से रूस को बाहर करने पर भी चर्चा की जा रही है। 
अभी हाल ही में 7 April को रूस को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद(UNHRC) से बाहर निकाल दिया गया है, इस मतदान में भी भारत सहित कुल 58 देश तटस्थ रहे।

हालांकि सरकार को बाहरी दबाव के आगे झुकने से इनकार करने के लिए गलत नहीं ठहराया जा सकता है, और यूक्रेन एवं इन पश्चिमी देशों के पिछले रिकार्ड को देखते हुए भारत सरकार द्वारा उठाए गए कदम तर्कसंगत हैं। लेकिन यूक्रेन में जमीनी स्थिति को देखते हुए भारत को संयुक्त राष्ट्र और द्विपक्षीय बातचीत में अपने रुख पर लचीला बने रहने के सिद्धांत पर विचार करना चाहिए। 

रूसी सेना पर आरोपित मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन की रिपोर्ट युद्ध के रंग को बदल सकती है, हालांकि आरोपों की स्वतंत्र जांच के लिए भारत का आह्वान एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है।  

इसके अलावा अमेरिका और यूरोपीय संघ द्वारा रूस पर आर्थिक प्रतिबंधों को कड़ा करने की संभावना है, क्योंकि मौजूदा प्रतिबंधों ने रूस को अपनी महत्त्वाकांक्षाओं पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर नहीं किया है। 

चूंकि रूस द्वारा पूर्वी यूक्रेन के क्षेत्रों को छोड़ने की संभावना नहीं है, क्योंकि इस संघर्ष को आरंभ करने से पूर्व ही उसने पूर्वी युक्रेन के 2 क्षेत्रों लुहांस्क और डोनेट्स्क को एक स्वतंत्र देश घोषित कर दिया था। साथ ही उसे अपने पश्चिमी प्रतिद्वंद्वियों से सैन्य प्रतिरोध की संभावना भी नहीं है। 


भारत ही निभा सकता है शांतिदूत की भूमिका

इस तरह से परस्पर प्रतिद्वंदिता एवं शत्रुता की होड़ में दो भागों में बंटी हुई इस दुनिया में शांति स्थापना की उम्मीद उसी देश से की जा सकती है, जिसका दोनों ही पक्षों के साथ एक समान संबंध हो, जिसका महत्व दोनों ही पक्षों के देशों के लिए बराबर हो, जिसकी आवाज सुनने की उत्सुकता दोनों ही पक्षों के नागरिकों एवं शासनाध्यक्षों में हो और इस भूमिका पर भारत पूरी तरह से खरा उतरता है।

यही कारण है कि बीते कुछ हफ्तों से शांति की चाह रखने वाले कुछ देश लगातार भारत यात्रा पर हैं, लगातार भारत से संपर्क बनाए हुए हैं और भारतीय प्रतिनिधियों के साथ मिलकर इस संघर्ष को खत्म करने की संभावनाओं पर विचार कर रहे हैं। साथ ही इसमें इस संघर्ष में भाग लेने वाले देशों और संघर्ष के लिए जिम्मेदार देशों के प्रतिनिधि भी शामिल हैं, जो भारत को अपने पक्ष में करने के लिए प्रयासरत हैं। 

इन सब को देखते हुए भारत की भूमिका और अधिक बढ़ जाती है क्योंकि भारत को "वसुधैव कुटुंबकम" की भावना का परिचय भी देना है और राष्ट्रहित को भी सुरक्षित करना है। मानवता की रक्षा को भी ध्यान में रखना है और अपने राष्ट्र के हित के लिए नीतियां भी बनानी है। इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत सरकार किस प्रकार से इस भूमिका का निर्वहन करती है।

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