रूस और यूक्रेन के बीच हो रही जंग के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या युक्रेन अमेरिका की व्यापारिक नीतियों एवं सामरिक महत्त्वाकांक्षाओं का शिकार हो गया?

पूर्वी यूरोप में जारी रूस एवं यूक्रेन के मध्य जंग में अब युक्रेन पूरी तरह से अकेला पड़ गया है। यूक्रेन के राष्ट्रपति ने सार्वजनिक तौर पर यह खुद स्वीकार किया है कि पूरी दुनिया ने यूक्रेन को रूस के खिलाफ जंग में अकेला छोड़ दिया है। किसी ने उसका साथ देने की कोशिश नहीं की। कोई आगे नहीं आया, न तो नाटो और न ही अमेरिका।

क्या नाटो देशों ने यूक्रेन से छल किया है?
युद्ध के पूर्व जिस प्रकार से पूरे पश्चिमी देश और अमेरिका अर्थात नाटो समूह के सभी सदस्य जिस प्रकार से यूक्रेन को नाटो में सम्मिलित करने की घोषणा कर रहे थे और उसे रूस के खिलाफ पूरी तरह से सैन्य एवं आर्थिक मदद करने का आश्वासन दे रहे थे, जिस प्रकार से रूस को हमला करने पर अंजाम भुगतने की धमकी और आर्थिक प्रतिबंध लगाने एवं सैन्य कार्यवाई की धमकी दे रहे थे, उसके यूक्रेन पर हमला करते ही ये सारी बातें हवा हवाई साबित होने लगी। पश्चिमी देशों और अमेरिका का वास्तविक चेहरा सबके सामने आने लगा कि किस प्रकार से उन्होंने अपने व्यापारिक नीतियों को फलीभूत करने के लिए यूक्रेन को रूस के खिलाफ हथियार के रूप में प्रयोग किया। यूक्रेन को रूस के साथ युद्ध की आग में झोंक कर उसको अकेला छोड़ दिया। युद्ध से पूर्व सैन्य सहयोग का वादा करने वाले नाटो समूह के सभी देश सैन्य सहायता के वादे से मुकर गए और सिर्फ आर्थिक प्रतिबंध लगाने की धमकी देकर खानापूर्ति कर रहे हैं जबकि वास्तव में रूस को अब इन देशों से लगने वाले आर्थिक प्रतिबंधों का कोई भय ही नहीं रह गया है क्योंकि बीते कई दशकों से जिस प्रकार से उस पर समय-समय पर अमेरिका और इन पश्चिमी देशों ने आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं, उसको अब इन प्रतिबंधों के साथ जीने और इनमें विकल्प तलाशने की आदत सी हो गई है। 

अब अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस पर जिन वैश्विक मुद्राओं में व्यापार करने पर प्रतिबंध लगाया है, उन मुद्राओं का विकल्प उसने वर्षों पहले से ही तैयार कर रखा है। आजकल पूरी दुनिया क्रिप्टोकरेंसी की ओर बढ़ रही है, जिसे डॉलर के समानांतर डिजिटल मुद्रा के रूप में पेश किया जा रहा है। रूस और चीन दोनों ही क्रिप्टो करेंसी में बहुत तेजी से निवेश कर रहे हैं, इसलिए अब उन्हें नाटो समूह के देशों द्वारा लगाए जाने वाले आर्थिक प्रतिबंधों का कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है। यही वजह है कि नाटो देशों की इतनी धमकियों के बावजूद रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया।

क्या अमेरिका और अन्य नाटो देश ही इस युद्ध के लिए जिम्मेदार हैं?
वास्तव में यही है अमेरिका और पश्चिमी देशों का असली चेहरा। दूसरों को भड़का कर, दूसरों को उकसा कर युद्ध की आग में झोंक कर स्वयं युद्ध से अलग हो जाना और फिर आर्थिक प्रतिबंधों की धमकी देना। जब तक युद्ध का आरंभ नहीं हुआ था, प्रतिदिन यूरोपीय देश और अमेरिका यूक्रेन को उकसाते रहते थे, प्रतिदिन सुबह से शाम तक सभी के Statements आते थे कि यदि रूस ने यूक्रेन पर हमला किया तो उसे इसके अंजाम भुगतने होंगे, हम यूक्रेन को अकेला नहीं छोड़ेंगे, रूस को मुंहतोड़ जवाब देंगे, ये करेंगे वो करेंगे और अब जब रूस ने इन सभी धमकियों को दरकिनार करके हमला कर दिया तो सभी ने अपने कदम पीछे खींच लिया। युद्ध से पहले सभी अपने सैनिक भेज रहे थे, अमेरिका भी यूरोप में तैनात अपने सैनिकों की संख्या लगातार बढ़ रहा था परंतु युद्ध आरंभ होते ही अब ऐसे स्टेटमेंट आने लगे कि हम यूक्रेन में सैनिक नहीं भेजेंगे। रूस पर कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगाएंगे, रूस को इस हमले के गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे, हम रूस की अर्थव्यवस्था तबाह कर देंगे। बस अब इसी तरह का लॉलीपॉप देकर दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं और यही छोटी-छोटी बातें, यही रहस्यमई बातें यूक्रेन, अफगानिस्तान, वियतनाम, इराक, सीरिया जैसे देश समझ नहीं पाते और अमेरिका की बातों में आ जाते हैं। 

अमेरिका के आज तक के सारे युद्धों का रिकॉर्ड रहा है वह दूसरों को भड़का कर दूसरों को उकसा कर युद्ध तो आरंभ करवा देता है परंतु खुद पीछे हट जाता है और फिर आर्थिक प्रतिबंध लगाने की धमकी देता है क्योंकि इसकी यही असली व्यापारिक नीति है कि शक्तिशाली देशों को या महाशक्ति बनते देशों को युद्ध की आग में झोंककर उनकी अर्थव्यवस्था बर्बाद करके खुद दुनिया की महाशक्ति बने रहना। उसने जानबूझकर युक्रेन को नाटो में शामिल करने की घोषणा करकेे, रूस के खिलाफ उसका साथ देने का वायदा करके रूस के विरुद्ध युद्ध के लिए उकसाया है ताकि रूस अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए यूक्रेन पर हमला करें और फिर उसके ऊपर आर्थिक प्रतिबंध लगाने का उसे अवसर मिले, जिससे अन्य देश रूस से हथियारों की खरीद फरोख्त ना कर सके और सीधे अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशों से करें। 

यही कार्य दशकों से अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश करते आ रहे हैं। ऐसा ही ईरान के साथ किया और रूस के साथ भी ऐसा पहले भी कर चुका है और अब तो रूस और ईरान को अमेरिका के इन प्रतिबंधों के साथ जीने और इनमें विकल्प तलाशने की आदत और अनुभव सा हो गया है, इसलिए अब इन प्रतिबंधों का ना तो इन देशों पर कोई विशेष असर होता है और ना ही इन्हें अब इन प्रतिबंधों से कोई भय है। तभी इतनी धमकियों के बावजूद रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया और हमले का नाम भी क्या दिया कि "यह मात्र सैन्य ऑपरेशन है।"
अपनी इसी आर्थिक कुनीति के चलते अमेरिका समय-समय पर पूरे विश्व को और सम्पूर्ण मानवता को युद्ध की आग में झोंकता रहा है फिर छोटे देश अमेरिका जैसे व्यापारिक भेड़िए को मित्र मानकर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं।
आज यूक्रेन के साथ भी यही हो रहा है, उसे भी एहसास हो गया होगा कि उसने कितनी बड़ी भूल कर दी है इन व्यापारी भेड़ियों के बहकावे में आकर। 
अमेरिकी नेतृत्व वाले नाटो समूह ने अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति करने के लिए आज यूक्रेन को युद्ध की आग में झोंक कर खुद को इससे अलग कर लिया है और Excuse क्या दे रहा है कि यूक्रेन अभी नाटो का सदस्य नहीं है, इसलिए हम यूक्रेन की सैन्य मदद नहीं कर सकते। यूक्रेन तो युद्ध आरंभ होने से पूर्व भी नाटो का सदस्य नहीं था तो उस समय जब सैन्य मदद नहीं कर सकते थे तो यूरोप में सैनिकों की संख्या बढ़ाकर उसे युद्ध के लिए उकसाया ही क्यों और जब नाटो को युक्रेन की सैन्य मदद करनी ही नहीं थी तो उसे इस बात का आश्वासन क्यों दिया कि रूस के हमला करने पर वे लोग उसकी रक्षा के लिए आगे जरूर आएंगे।

पहले तो अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए और रूस को काउंटर करने के लिए उसके लाख विरोध के बावजूद यूक्रेन को नाटो में शामिल करने की घोषणा की और फिर "अभी यूक्रेन नाटो में शामिल नहीं है" का excuse देकर पीछे हट गए। 
 नाटो और अमेरिका के लिए अपनी सुरक्षा, अपनी शक्ति, अपने सामरिक नीतियों और सामरिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति करना इतना आवश्यक हो गया था कि उसके आगे दूसरों के राष्ट्रीय हितों, दूसरों की राष्ट्रीय सुरक्षा और सबसे महत्वपूर्ण बात संपूर्ण मानवता बौनी पड़ गई। 

आज पूरा यूक्रेन युद्ध की आग में धधक रहा है, हजारों लाखों लोग हमले के खतरे में हर पल मृत्यु के साए में जी रहे हैं, किसी को यह पता नहीं है किसकी मृत्यु कब आ जाए। हर कोई भय के माहौल में जी रहा है परंतु इन सभी सत्ता के नशे में चूर सत्ताधीशों के लिए केवल और केवल अपनी सामरिक और सैन्य नीति ही मायने रखती है, इनके लिए मानवता और विश्व शांति जैसी चीजें अर्थहीन हैं।  
इन सभी राजसत्ताओें को, सभी देशों के प्रमुखों को मानव हित को सर्वोपरि रखना चाहिए, युद्ध तो आखरी विकल्प होता है। बिना बातचीत किए, बिना एक दूसरे की आवश्यकताओं, खतरों और सुरक्षा को महत्व दिए सिर्फ अपने विषय में सोचना तो निसंदेह युद्ध को ही आमंत्रण देगा और वही इस समय यूक्रेन में रहा है।

एक टिप्पणी भेजें

1 टिप्पणियाँ

If you have any query or suggestion, please write here.....................